عربی ہفتم دورہ حدیث شریف

فضل المنعم في شرح صحيح مسلم ٣
فضل المنعم في شرح صحيح مسلم ٣
فضل المنعم في شرح صحيح مسلم ٤
فضل المنعم في شرح صحيح مسلم ٤
فضل المنعم في شرح صحيح مسلم ٥
فضل المنعم في شرح صحيح مسلم ٥
فضل المنعم في شرح صحيح مسلم ٦
فضل المنعم في شرح صحيح مسلم ٦
زبدة الشمائل شرح شمائل ترمذی
زبدة الشمائل شرح شمائل ترمذی
صحاح ستہ اور ان کے مصنفین
صحاح ستہ اور ان کے مصنفین
الدر المنضود شرح سنن ابی داؤد جلد ١
الدر المنضود شرح سنن ابی داؤد جلد ١
الدر المنضود شرح سنن ابی داؤد جلد ٢
الدر المنضود شرح سنن ابی داؤد جلد ٢
الدر المنضود شرح سنن ابی داؤد جلد ٣
الدر المنضود شرح سنن ابی داؤد جلد ٣

इल्म (ज्ञान) का बदसूरत आशिक़

इल्म (ज्ञान) का बदसूरत आशिक़

असली नाम अम्र बिन महबूब था, 160 हिजरी में पैदा हुए और 'जाहिज़' के लक़ब (उपाधि) से मशहूर हुए। अरबी में जाहिज़ उसे कहते हैं जिसकी आँखों के ढेले (पुतलियाँ) बाहर की ओर उभरे हुए हों। शुरुआत में वे इस लक़ब को नापसंद करते थे, लेकिन रफ़्ता-रफ़्ता (धीरे-धीरे) ख़ामोश हो गए। शायद ही किसी के रूप-रंग का इस तरह मज़ाक़ उड़ाया गया हो; किसी ने उन्हें शैतान से तशबीह (तुलना) दी है और किसी शायर ने तो यहाँ तक कह दिया: "अगर सूअर का रूप दोबारा बिगाड़ (مسخ) दिया जाए, तब भी वह जाहिज़ से कम ही बदसूरत होगा।" बादशाह मुतवक्किल ने उन्हें अपने बच्चों का उस्ताद मुक़र्रर (नियुक्त) करना चाहा, लेकिन जब उनकी शक्ल देखी तो इंकार कर दिया। हालांकि वे मोतज़िली (معتزلی) विचारधारा से जुड़े थे, इसके बावजूद वे अरबी अदब (साहित्य) के इमाम (शिरोमणि) माने जाते हैं। कहा जाता है: "जाहिज़ ने जिस किताब को पकड़ लिया, उसे मुकम्मल (पूरा) पढ़ने तक नीचे नहीं रखा।" वे अक्सर किताबों की दुकानें किराए पर लेकर रात-रात भर पढ़ते रहते थे। आख़िरी उम्र में वे कई बीमारियों का शिकार हुए, आधा जिस्म मफ़लूज (लकवाग्रस्त) हो गया। वे इसी हालत में पढ़ने में मसरूफ़ (व्यस्त) थे कि आस-पास रखी किताबें उन पर आ गिरीं, और इस तरह इल्म का वह बदसूरत आशिक़ किताबों के क़ब्रिस्तान में दफ़्न हो गया। (अली सिनान)

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