عربی ہفتم دورہ حدیث شریف

تحفة الأحوذي بشرح جامع الترمذی الجزء التاسع
تحفة الأحوذي بشرح جامع الترمذی الجزء التاسع
تحفة الأحوذي بشرح جامع الترمذی الجزء العاشر
تحفة الأحوذي بشرح جامع الترمذی الجزء العاشر
تفہیم المسالک شرح مؤطا امام مالک
تفہیم المسالک شرح مؤطا امام مالک
آسان ترجمہ صحیح بخاری
آسان ترجمہ صحیح بخاری
روضۃ المسلم شرح مقدمۃ المسلم
روضۃ المسلم شرح مقدمۃ المسلم
کشف الباری عما فی صحیح البخاری جلد ٥
کشف الباری عما فی صحیح البخاری جلد ٥
کشف الباری عما فی صحیح البخاری جلد ٦
کشف الباری عما فی صحیح البخاری جلد ٦
کشف الباری عما فی صحیح البخاری جلد ٧
کشف الباری عما فی صحیح البخاری جلد ٧
کشف الباری عما فی صحیح البخاری جلد ٨
کشف الباری عما فی صحیح البخاری جلد ٨

फ़िलिस्तीनी मुद्दा और हमारी ज़िम्मेदारियाँ

फ़िलिस्तीनी मुद्दा और हमारी ज़िम्मेदारियाँ

हज़रत मौलाना अशरफ़ अली थानवी साहब (रहमतुल्लाह अलैह) की मशहूर तसनीफ़ (पुस्तक) 'हयातुल मुस्लिमीन' के शुरू में "तसहील-ए-मुक़द्दमा" के उनवान (शीर्षक) से मुफ़्ती मोहम्मद शफ़ी साहब (रहमतुल्लाह अलैह) का एक अहम मुक़द्दमा (प्रस्तावना) शामिल है। इसमें हज़रत मुफ़्ती साहब ने आलम-ए-इस्लाम (इस्लामी दुनिया) और मुसलमानों के ज़वाल व पतन पर हज़रत थानवी (रहमतुल्लाह अलैह) की बेचैनी, इज़्तिराब (घबराहट) और फ़िक्रमंदी के बारे में तहरीर फ़रमाया है: "जहाँ कहीं मुसलमानों पर कोई मुसीबत आती या किसी परेशानी की ख़बर आती, वे ग़म में इस तरह घुलने लगते थे जैसे किसी शफ़ीक़ (दयालु) बाप की औलाद पर कोई मुसीबत आई हो। खंज़र चले किसी पे तड़पते हैं हम अमीर, सारे जहाँ का दर्द हमारे जिगर में है। इससे यह अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि इस पुर-फ़ितन (उपद्रवी) दौर में ऐसे जज़्बात रखने वाले को चैन और आराम कहाँ? खुद मैंने बारहा (कई बार) देखा कि जब कोई फ़ित्ना मुसलमानों में चला जिससे उनकी दीनी या दुनियावी तबाही का ख़तरा था, तो हज़रत का निज़ाम-ए-सेहत (स्वास्थ्य) मुख़्तल (बिगड़ना) और क़ुव्वत (शारीरिक शक्ति) में कमज़ोरी व सुस्ती नज़र आने लगती थी। एक ऐसे ही फ़ित्ने के ज़माने में उन्होंने खुद फ़रमाया कि: 'मुसलमानों की मौजूदा हालत और उसके नताइज (परिणामों) का तसव्वुर (विचार) अगर खाने से पहले आ जाता है तो भूख उड़ जाती है और सोने से पहले आ जाता है तो नींद उड़ जाती है।'" (बहवाला: हयातुल मुस्लिमीन, सफ़्हा: 7, मतबूआ मकतबतुल मीज़ान) जिन लोगों को अल्लाह तआला के फ़ज़्ल व करम से इल्म की हक़ीक़त नसीब हुई, उनका हमेशा यही तर्ज़-ए-अमल (तरीक़ा) रहा है कि वे पूरी दुनिया में मुसलमानों के मसाइल (समस्याओं) को अपना मसला समझते थे और इसके लिए हर लिहाज़ से फ़िक्रमंद रहते थे। अकाबिर उलेमा-ए-किराम और बुज़ुर्गान-ए-दीन में इसकी दस्यों नहीं बल्कि सैकड़ों मिसालें मिल जाएंगी। इसी बात के तनाज़ुर (संदर्भ) में आज हमें मसला-ए-फ़िलिस्तीन (फ़िलिस्तीन के मुद्दे) को सामने रखकर अपना जायज़ा (मूल्यांकन) लेना चाहिए कि इस अहम तरीन मसले से मुतअल्लिक़ हमारी फ़िक्रमंदी और बेचैनी किस दर्जे की है? जितना कुछ हम कर सकते हैं, क्या वह हम कर रहे हैं? क्या हम अहल-ए-फ़िलिस्तीन के लिए उसी तरह दुआएं मांग रहे हैं जिस तरह अगर ख़ुदा ना ख़्वास्ता हमारी अपनी औलाद, वालिदैन, भाई-बहन किसी मुश्किल में गिरफ़्तार होते तो हम उनके लिए मांगते......! दुआ मोमिन का हथियार है, इस हथियार का इस्तेमाल कीजिए और दर्द-ए-दिल के साथ, तज़र्रु (अत्यंत नम्रता) व आजिज़ी के साथ अपने मक़हूर (उत्पीड़ित) और मक़्लूम भाइयों के लिए सरापा दुआ बन जाइए। अल्लाह पाक हमें तौफ़ीक़ अता फ़रमाए और अहल-ए-फ़िलिस्तीन को ज़ुल्म व जबर से ख़लासी (मुक्ति) नसीब फ़रमाए। आमीन। -------- तहरीर: अबू मुआज़ राशिद हुसैन ---------- (मंकूल/वर्णित)

सबसे हालिया

Naats