عربی ہفتم دورہ حدیث شریف

احسان الباری لفہم البخاری
احسان الباری لفہم البخاری
فضل الباری فی درس البخاری جلد ۱
فضل الباری فی درس البخاری جلد ۱
فضل الباری فی درس البخاری جلد ۲
فضل الباری فی درس البخاری جلد ۲
فضل الباری فی درس البخاری جلد ۳
فضل الباری فی درس البخاری جلد ۳
فضل الباری فی درس البخاری جلد ۴
فضل الباری فی درس البخاری جلد ۴
درس شمائل ترمذی
درس شمائل ترمذی
القول النقی فی شرح جامع الترمذی جلد ۱
القول النقی فی شرح جامع الترمذی جلد ۱
القول النقی فی شرح جامع الترمذی جلد ۲
القول النقی فی شرح جامع الترمذی جلد ۲
القول النقی فی شرح جامع الترمذی جلد ۳
القول النقی فی شرح جامع الترمذی جلد ۳

सच्चा राज़िक़ (अन्नदाता) कौन?

सच्चा राज़िक़ (अन्नदाता) कौन?

✍🏻मुलाज़िम बहुत ही आज्ञाकारी था। मालिक ने खुश होकर उसकी पांच हजार तनख्वाह बढ़ा दी। उसकी आज्ञाकारिता में कोई फ़र्क नहीं आया, लेकिन वह बहुत ज़्यादा शुक्रगुज़ार भी नहीं हुआ। मालिक को बहुत ग़ुस्सा आया कि मैंने इसकी तनख्वाह बढ़ाई लेकिन इसने अच्छे से शुक्रिया भी अदा नहीं किया। उसने अगले महीने तनख्वाह पांच हजार कम कर दी। मुलाज़िम की आज्ञाकारिता अब भी वही रही, उसने कोई शिकायत नहीं की। मालिक ने उसे बुलवाया और कहा, "बड़े अजीब इंसान हो, मैंने तुम्हारी तनख्वाह पांच हजार बढ़ाई, फिर कम कर दी। तुम जैसे के तैसे रहे। यह सब क्या है?" मुलाज़िम बोला, "ओह! आपने खुद को राज़िक़ (अन्नदाता) समझ लिया था? मेरे यहाँ बेटा पैदा हुआ तो उसके अगले दिन आपने तनख्वाह पांच हजार बढ़ा दी। मैं समझ गया कि जिस ख़ालिक़ (सृष्टिकर्ता) ने बच्चा दिया है, उसी ने उसके रिज़्क़ (रोज़ी-रोटी) का इंतज़ाम भी साथ ही कर दिया है, इसलिए उसी का शुक्रिया अदा किया। फिर जिस दिन मेरी वालिदा (माँ) का इंतक़ाल हुआ, उसी दिन आपने तनख्वाह कम कर दी। मैंने जान लिया कि वह अपना रिज़्क़ अपने साथ ले गईं, इसलिए तब भी अल्लाह का शुक्र अदा करके संतुष्ट रहा।" 🖋️फिर बोला, "साहब, ये रोज़ी-रोटी के फ़ैसले कहीं और ही होते हैं। हम तो बस मोहरे हैं जिन्हें आगे-पीछे करके सिर्फ़ ज़रिया पैदा किया जाता है।"

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