عربی ہفتم دورہ حدیث شریف

سنن ابن ماجہ مترجم جلد 3
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سنن ابن ماجہ عربی اردو
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سنن نسائی مترجم
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صحیح البخاری جلد 1
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صحیح البخاری جلد 2
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صحیح البخاری
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हजरत मौलाना अशरफ अली साहब थानवी खुद अपनी नजर में

हजरत मौलाना अशरफ अली साहब थानवी खुद अपनी नजर में

हकीमुल उम्मत हज़रत मौलाना अशरफ अली थानवी (रहमतुल्लाही अलैहि) से थाना भवन में तैनात एक पुलिस अधिकारी ने बैअत (आध्यात्मिक दीक्षा) का अनुरोध किया, जिसके जवाब में आपने उन्हें अपना परिचय देते हुए लिखा: "मैं एक खुश्क (सरल/रूखा) तालिब-ए-इल्म (विद्यार्थी) हूँ। इस ज़माने में जिन चीज़ों को दरवेशी (सूफ़ीवाद) के लिए ज़रूरी समझा जाता है, जैसे मिलाद शरीफ़, ग्यारहवीं, उर्स, नियाज़, फ़ातिहा, कव्वाली और तसर्रुफ़ (आध्यात्मिक नियंत्रण) वगैरह—मैं इन सब से महरूम (वंचित) हूँ और अपने दोस्तों को भी इसी खुश्क तरीक़े पर रखना पसंद करता हूँ। मैं न तो साहब-ए-करामत (चमत्कार करने वाला) हूँ और न साहब-ए-कश्फ़ (दिव्य दृष्टि वाला), न साहब-ए-तसर्रुफ़ हूँ और न ही आमिल (तंत्र-मंत्र करने वाला)। मैं सिर्फ़ अल्लाह और अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के अहकामात (आदेशों) से अवगत कराता रहता हूँ। अपने दोस्तों से किसी क़िस्म का तकल्लुफ़ (औपचारिकता) नहीं करता, न अपनी हालत, न अपनी कोई तालीम, और न ही दीनी मामलों (धार्मिक मामलों) के मुतालिक कोई मशवरा (सलाह) छुपाना चाहता हूँ। अमल करने पर किसी को मजबूर नहीं करता, हाँ, अमल करता हुआ देखकर ख़ुश और अमल से दूर देखकर रंजिदा (दुखी) ज़रूर होता हूँ। मैं किसी से न कोई फ़रमाइश करता हूँ और न किसी की सिफ़ारिश, इसलिए कुछ राय रखने वाले लोग मुझे खुश्क कहते हैं। मेरा मिज़ाज (तरीक़ा) यह है कि एक की रियायत (पक्ष) के चक्कर में दूसरे को कोई तकलीफ़ (अज़ियत) न दूँ, चाहे वह केवल ज़ुबानी (हर्फ़ी) तकलीफ़ ही क्यों न हो। सबसे ज़्यादा एहतेमाम (ध्यान) मुझे अपने लिए और अपने दोस्तों के लिए इस बात का है कि किसी को किसी क़िस्म की अज़ियत (तकलीफ़) न पहुँचाई जाए; चाहे वह जिस्मानी (शारीरिक) हो जैसे मार-पीट, चाहे माली (आर्थिक) हो जैसे किसी का हक़ मार लेना या नाहक़ कोई चीज़ ले लेना, चाहे आबरू (सम्मान) के मुतालिक हो जैसे किसी की तहक़ीर (अपमान करना) या किसी की ग़ीबत (पीठ पीछे बुराई करना), चाहे नफ़्सानी (मानसिक/भावनात्मक) हो जैसे किसी को किसी तश्वीश (चिंता) में डालना या कोई नागवार व दुखद मामला करना। और अगर अपनी ग़लती से ऐसी कोई बात हो जाए, तो माफ़ी माँगने में कोई शर्म महसूस न करना। मुझे इन चीज़ों का इस क़दर एहतेमाम है कि किसी का हुलिया शरीअत के ख़िलाफ़ देखकर तो सिर्फ़ शिकायत (नापसंदगी) होती है, मगर इन चीज़ों (दूसरों को तकलीफ़ न देने) में कोताही (लापरवाही) देखकर बेहद सदमा पहुँचता है और दुआ करता हूँ कि अल्लाह इससे निजात (मुक्ति) दे।"

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