عربی ہفتم دورہ حدیث شریف

انعام الباری فی شرح اشعار البخاری
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آسان اصطلاحات حدیث شرح تیسیر مصطلح الحدیث
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سنن ابو داود مترجم مع مختصر شرح جلد ١
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سنن ابو داود مترجم مع مختصر شرح جلد ٢
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تکمیل الحاجة شرح اردو ابن ماجہ
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الجامع الکبیر (سنن الترمذی)
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نعمة الباری علی ختم البخاری
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بذل المجھود فی حل سنن ابی داود الجزء ١
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बच्चों को मस्जिदों से दूर न करें

बच्चों को मस्जिदों से दूर न करें

आज के दौर में जब सामाजिक बदलाव और आधुनिक तकनीक (टेक्नोलॉजी) का दबदबा बढ़ता जा रहा है, बच्चों के लिए मोबाइल, टीवी और अन्य मनोरंजन के साधनों में व्यस्त होना आसान हो गया है। इंटरनेट और सोशल मीडिया की वजह से वे घर बैठे ही दुनिया भर की गतिविधियों में शामिल हो सकते हैं। लेकिन इसके साथ ही यह भी एक हक़ीक़त है कि ऐसे में उनका दीन (धर्म) से, मस्जिद से और अपनी परंपराओं से रिश्ता कमज़ोर होता जा रहा है। मस्जिद एक ऐसी जगह है जहाँ बच्चों को न केवल दीन की बुनियादी शिक्षा मिलती है, बल्कि वे नैतिक और आध्यात्मिक प्रशिक्षण (तरबियत) भी पाते हैं। लेकिन अफ़सोस की बात यह है कि अक्सर माता-पिता और बड़ों की ओर से बच्चों को मस्जिद लाने में दिलचस्पी नहीं ली जाती, या जब वे आते भी हैं, तो उन्हें शोर मचाने, तंग करने या खेलने की वजह से डांट कर वापस घर भेज दिया जाता है। यह रवैया बेहद नुक़सानदेह है, क्योंकि मस्जिद वह जगह है जहाँ बच्चों को इस्लाम के बुनियादी नियम और इबादत (पूजा-प्रार्थना) सीखने के मौक़े मिलते हैं। बच्चों को मस्जिदों से दूर करना या उन्हें वहाँ कम आने देना इस बात का कारण बन सकता है कि भविष्य में हमारी मस्जिदें वीरान (ख़ाली) रह जाएँ। जो बच्चे आज मस्जिद में नमाज़, क़ुरआन और इबादत से नहीं जुड़ेंगे, वे कल दीन के प्रतीकों (शआर) को कैसे ज़िंदा रखेंगे? यही बच्चे बड़े होकर हमारी क़ौम के रहनुमा (नेता) बनेंगे और अगर उन्हें दीन से मोहब्बत और इसके आदाब (शिष्टाचार) नहीं सिखाए गए, तो वे सामाजिक रूप से और भी दूर होते चले जाएँगे। इसलिए, हमें चाहिए कि हम बच्चों को मस्जिदों में आने के लिए प्रेरित करें (तरग़ीब दें) और उनके लिए एक दोस्ताना और ख़ुशनुमा माहौल पैदा करें। बच्चों को प्यार से समझाएं कि मस्जिद में कैसा बर्ताव करना है, उनकी छोटी-छोटी ग़लतियों को नज़रअंदाज़ (दरगुज़र) करें और उन्हें समय-समय पर इनाम देकर उनका हौसला बढ़ाएं। इस तरह वे ख़ुशी-ख़ुशी मस्जिद आएँगे और दीन से एक मज़बूत रिश्ता क़ायम करेंगे। याद रखें, आज के ये बच्चे कल हमारे दीन के वारिस हैं। अगर हम उन्हें आज मस्जिद से दूर करेंगे, तो कल हमारी मस्जिदें वाक़ई वीरान हो सकती हैं। बच्चों को दीन सिखाने और मस्जिद से जोड़ने की ज़िम्मेदारी हम सबकी है। ____________📝📝____________ मंक़ूल (साभार)। चयन: इस्लामिक ट्यूब प्रो ऐप।

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