بذل المجھود فی حل سنن ابی داود الجزء ١
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तौहीद के दरजात (एकेश्वरवाद के चरण)

तौहीद के दरजात (एकेश्वरवाद के चरण)

मुस्निद अल-हिंद, इमाम-ए-अकबर हज़रत शाह वलीउल्लाह मुहद्दिस देहलवी ؒ ने इर्शाद फ़रमाया है कि अक़ीदा-ए-तौहीद की तकमील (पूर्णता) के लिए चार दर्जों की तौहीद का मानना लाज़िम है, अगर किसी भी दर्जे की तौहीद में ज़र्रा बराबर भी कमी रह जाएगी तो इंसान हरगिज़ मुवह्हिद (एकेश्वरवादी) नहीं कहलाया जा सकता, वे चार दर्जे ये हैं: (1) तौहीद-ए-ज़ात: यानी यह मानना कि वाजिब-उल-वजूद ज़ात जो हमेशा से है और हमेशा रहने वाली है, वह सिर्फ अल्लाह तआला की ज़ात है, यह बात अल्लाह तआला के अलावा किसी दूसरे में क़तअन नहीं पाई जाती। (2) तौहीद-ए-ख़ल्क़: यानी यह तस्लीम करना कि आसमान व ज़मीन, अर्ष व कुर्सी और तमाम मख़्लूकात का ख़ालिक़ सिर्फ और सिर्फ अल्लाह तबारक व तआला है, सिफ़त-ए-ख़ल्क़ में उसका कोई सहीम व शरीक (साझेदार) नहीं है, इसको तौहीद (रुबूबियत भी कहते हैं)। (3) तौहीद-ए-तदबीर: यानी यह यक़ीन करना कि कायनात में जो कुछ भी हुआ है या हो रहा है या आइंदा होने वाला है, उन सब का चलाने वाला सिर्फ और सिर्फ अल्लाह तआला है, इस निज़ाम को चलाने में किसी ग़ैर को दूर-दूर तक कोई दख़्ल नहीं है, और अल्लाह तआला अपनी मर्ज़ी का ख़ुद मालिक है, उसके फ़ैसले को कोई रोक नहीं सकता। (4) तौहीद-ए-उलूहियत: यानी यह अक़ीदा रखना कि इबादत के लायक़ सिर्फ अल्लाह की ज़ात है, अल्लाह तआला के अलावा किसी को माबूद बनाना हरगिज़ जाइज़ नहीं है, और तौहीद-ए-तदबीर के लिए तौहीद-ए-उलूहियत लाज़िम है, यानी जो कायनात को चलाने वाला है बस वही इबादत के लायक़ है। (हुज्जतुल्लाह अल-बालिग़ा, मअ रहमतुल्लाह अल-वासिआ 590/1) तौहीद के दर्ज-ए-बाला (उपरोक्त) दरजात में से अव्वल दो दर्जे यानी तौहीद-ए-ज़ात और तौहीद-ए-ख़ल्क़ आम तौर पर बहुत से मुशरिकों के नज़दीक भी क़ाबिल-ए-क़बूल थे, और आज भी अक्सर मुशरिकों का यही हाल है कि वे ख़ालिक़ तो सिर्फ एक ही को मानते हैं (जिसे वे अपनी ज़बान में "ईश्वर" या "भगवान" वग़ैरह का नाम देते हैं) लेकिन तौहीद के तीसरे और चौथे दर्जे को वे मानने पर न कल तैयार थे और न आज तैयार हैं। हालांकि उनको माने बग़ैर ईमान का कोई तसव्वुर नहीं किया जा सकता। (शरह अल-अक़ीदा अत-तहाविया लि-इमाम इब्न अबील इज़्ज़ अद-दिमश्क़ी 21) (मुस्तफ़ाद अज़ रहमान के ख़ास बंदे / सफ़ा: 196)

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