एक बार मैं शेख हज़रत मौलाना मसीहउल्लाह ख़ान साहब रहमतुल्लाह अलैह के पास बैठा हुआ था और उस समय वहां और कोई नहीं था, केवल मैं था। इसी बीच एक आदमी आया और हज़रत से तावीज़ मांगने लगा। हज़रत ने कहा कि मैं तावीज़ नहीं दिया करता। जाओ भाई जान से ले लो! (भाई जान से मुराद हज़रत के साहबज़ादे हैं, जिन्हें छात्र और आम लोग सब भाई जान कहते हैं)। वह व्यक्ति बाहर गया, फिर थोड़ी देर बाद आकर कहने लगा, हज़रत! आप ही दे दीजिए। हज़रत वाला रहमतुल्लाह अलैह ने फिर फ़रमाया: मैं तावीज़ नहीं दिया करता, भाई जान से ले लो। वह व्यक्ति फिर बाहर गया और कुछ देर के बाद फिर आकर इसी तरह कहा कि हज़रत! तावीज़ आप ही दे दीजिए, हज़रत ने फिर वही जवाब दिया और उसे भेज दिया और मेरी तरफ देखकर फ़रमाने लगे: भाई! हम तो सुनार थे, लोगों ने हमें लोहार समझ लिया, यानी कोई सुनार के पास लोहे का कुछ काम बनवानी ले जाए तो यह 'वज़उश-शइ फ़ी ग़ैरी महल्लिह' (किसी चीज़ को उसकी सही जगह के अलावा कहीं और रखना) की श्रेणी में होगा। इसी तरह आज लोग अल्लाह वालों के पास अपनी सुधार (इस्लाह) कराने, अल्लाह की मारिफ़त (पहचान) हासिल करने, धार्मिक बातें जानने और अल्लाह तक पहुँचने के रास्ते मालूम करने के बजाय, तावीज़ के बारे में पूछने जाते हैं, दुनिया के बारे में मालूम करने जाते हैं कि हज़रत मेरा फ़लाँ काम रुक गया है, हल कर दीजिए इत्यादि। एक बार जब हज़रत शाह अबरारुल हक़ साहब रहमतुल्लाह अलैह बीमार होकर मुंबई में उपचाराधीन थे, मैं वहां हज़रत की ज़ियारत (मुलाकात) के लिए हाज़िर हुआ। अस्र के बाद लोग ज़ियारत और मुलाकात के लिए हाज़िरी देते थे और हज़रत वाला कभी खुद पांच-दस मिनट बयान (प्रवचन) करते और कभी कोई मेहमान आलिम (विद्वान) होते, तो उन्हें वअज़ (उपदेश) कहने का हुक्म देते थे। उस दिन मुझसे फ़रमाया कि आज आप कुछ दीनी बातें लोगों को बता दें। हुक्म की तामीर (पालन) में जब मैं बयान कर रहा था, तो हज़रत वाला भी ऊपर से, जहां उनका क़ियाम (निवास) था, तशरीफ़ ले आए और उसमें मैंने हज़रत मसीहुल उम्मत का यही वाक़या भी सुनाया, तो हज़रत वाला इससे बहुत प्रभावित हुए और फ़रमाया कि मौलाना ने बड़ी ख़ूब बात फ़रमाई, बड़ी ख़ूब बात फ़रमाई। (घटनाएं पढ़िए और सबक हासिल कीजिए) ___________📝📝___________ मनक़ूल। चयन: इस्लामिक ट्यूब। ____________📝📝____________
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