ज्ञान में मग्न रहने की अद्भुत और दिलचस्प घटनाएँ

ज्ञान में मग्न रहने की अद्भुत और दिलचस्प घटनाएँ

सल्फ़-ए-सालिहीन (नेक पूर्वजों), मुहाद्दिसीन (हदीस के विद्वानों) और फ़ुक़हा (शरिया कानून के विशेषज्ञों) पर इल्म (ज्ञान) में व्यस्त रहने का किस कदर ग़लबा (असर) था, इसका कुछ अंदाज़ा नीचे दी गई अजीब-ओ-ग़रीब और दिलचस्प घटनाओं से लगाया जा सकता है: (१) इमाम अबू अल-अब्बास मुहम्मद बिन यक़ूब अल-असम के बारे में इमाम नैशापुरी फ़रमाते हैं कि मैं एक मर्तबा उनसे मिलने के लिए उनकी मस्जिद में पहुँचा। अस्र का वक़्त हो चुका था, तो शेख अबू अल-अब्बास अल-असम अज़ान देने के लिए "मिअज़ना" (अज़ान देने की ऊँची जगह/मीनार) पर तशरीफ़ ले गए। लेकिन वहाँ पहुँचकर अज़ान देने के बजाय बहुत बुलंद (ऊँची) आवाज़ में यह पढ़ना शुरू कर दिया: "अख़बरना अर-रबीअ बिन सुलैमान अख़बरना अश-शाफ़िई" (हमें रबीअ बिन सुलैमान ने बताया, हमें शाफ़िई ने बताया)। फिर जब उन्हें ख़्याल आया तो वे ख़ुद भी हँसे और जिन्होंने सुना वे भी बहुत महज़ूज़ (आनंदित) हुए, फिर उन्होंने अज़ान दी। (२) ख़तीब बग़दादी ने इब्न शाहीन के हवाले से लिखा है कि इमाम अल-हाफ़िज़ अबू बक्र मुहम्मद बिन मुहम्मद अल-बाग़ंदी एक मर्तबा नमाज़ पढ़ाने के लिए मुसल्ले (नमाज़ की जगह) पर पहुँचे, और तकबीर-ए-तहरीमा कही। फिर सूरह-ए-फ़ातिहा पढ़ने के बजाय उन्होंने "हद्दसना लुवैन व अनबअना शैबान बिन अल-फ़र्रूख़ अल-अैली" पढ़ना शुरू कर दिया। तो पीछे से मुक़्तदियों (पीछे नमाज़ पढ़ने वालों) ने 'सुब्हान अल्लाह' कहकर लुक़्मा दिया (टोककर याद दिलाया), तब उन्होंने सूरह फ़ातिहा शुरू की। (३) अल्लामा इब्न अल-जौज़ी ने लिखा है कि क़ाज़ी अबू जाफ़र मुहम्मद बिन अहमद बिन महमूद अन-नसफ़ी अल-हनफ़ी फ़िक़्ह (इस्लामी न्यायशास्त्र) के बड़े आलिम थे, और ज़ाहिद-फ़िद-दुनिया (दुनिया से बे-रग़बत) और तंगदस्त (ग़रीब) शख़्स थे। एक रात अत्यंत तंगदस्ती के ज़माने में वे मुताले (अध्ययन) में मग्न थे कि फ़िक़्ह के जिस जुज़इया (मसाले/बिंदु) की तलाश थी, वह अचानक उन्हें मिल गया। जिसे देखकर उन पर ऐसी स्थिति तारी हुई कि वे खड़े होकर घर में रक़्स (नाचने) करने लगे और कहने लगे कि "कहाँ हैं दुनिया के बादशाह और शहज़ादे?" तो उनकी बीवी यह मंज़र देखकर हैरान रह गई। (४) हज़रत इमाम मुहम्मद इब्न अल-हसन अश-शैबानी रहमतुल्लाह अलैहि रात भर जागकर मुश्किल मसलों के हल में मग्न रहते थे, लेकिन रातों-रात जागने के बावजूद उन्हें कुछ भी थकावट का एहसास तक न होता था। और उनकी ज़बान पर यह जुमला होता था: "अयना अब्नाउल मुलूकि मिन हाज़िहि लज्ज़ात" (शहज़ादों को यह लज़्ज़तें कहाँ नसीब हैं!) (मआलिम इर्शादिया, हाशिया ८०)। ____📝📝📝____ किताब: उलेमा और तुलबा के लिए फ़िक्र अंगेज़ और कारआमद बातें। पेज नंबर: ५९ - ६० । लेखक: मुफ़्ती सलमान साहब मन्सूरपुरी। चयन: इस्लामिक ट्यूब प्रो ऐप।

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