शुक्र अदा करने का एक फायदा तो यह होगा कि आपकी की हुई इबादत अल्लाह के हुज़ूर में क़बूल व मंज़ूर होगी क्योंकि अल्लाह को शुक्र बड़ा पसंद है। दूसरा फायदा यह होगा कि अल्लाह की तरफ से इबादत की मज़ीद (और ज़्यादा) तौफ़ीक़ मिलेगी। चुनाँचे अल्लाह तआला ख़ुद फ़रमाते हैं: 'अगर तुम शुक्र करोगे तो हम तुम्हें वह नेमत मज़ीद देंगे।' किसी इबादत के करने पर हमने अल्लाह का शुक्र अदा कर लिया तो इन शा अल्लाह, अल्लाह तआला की बारगाह में वह इबादत क़बूल होकर मज़ीद तौफ़ीक़ मिलने का सबब (कारण) बनेगी। हज़रत इमाम ग़ज़ाली (रहमतुल्लाह अलैह) ने एक अद्भुत (عجیب) बात तहरीर फ़रमाई है, वह भी सुनते चलें। फ़रमाते हैं कि पाँच चीज़ें ऐसी हैं जिनके बारे में अल्लाह तआला ने इस्तथनाई सूरत (अपवाद या शर्त वाली स्थिति) इख़्तियार फ़रमाई है, यानी उन्हें ज़िक्र करते वक़्त यह क़ैद (शर्त) लगा दी है कि ये चीज़ें उनकी मर्ज़ी पर मौक़ूफ़ (निर्भर) होंगी; अगर देना चाहेंगे तो दे देंगे, नहीं चाहेंगे तो नहीं देंगे। फिर यह भी उनकी मर्ज़ी है कि जिसे देना चाहेंगे देंगे, जिसे नहीं देना चाहेंगे नहीं देंगे। (१) पहली चीज़ 'इग़ना' (اِغناء) है, जिसके मायने ग़नी (समृद्ध) करने और मालदार करने के हैं। फ़रमाया: 'तो आइंदा ग़नी कर देगा तुमको अपने फ़ज़्ल से अगर वह चाहेगा।' (२) दूसरी चीज़ 'इजाबत' (اجابةُ) है, जिसके मायने क़बूलियत और दुआ स्वीकार करने के हैं। फ़रमाया: 'फिर वह दूर कर देता है उस मुसीबत को जिसके लिए उसको पुकारते हो अगर चाहता है।' मुसीबत का दूर होना दुआ की क़बूलियत पर निर्भर है और दुआ की क़बूलियत अल्लाह की मर्ज़ी पर निर्भर है; चाहें तो क़बूल करें, न चाहें तो न करें। (३) तीसरी चीज़ 'रिज़्क़' (आजीविका) है। इसके बारे में फ़रमाया: 'और अल्लाह रोज़ी देता है जिसे चाहता है बे-हिसाब।' यानी बे-हिसाब व बे-शुमार रोज़ी देना अल्लाह की मर्ज़ी पर निर्भर है; जिसे चाहते हैं देते हैं, जिसे नहीं चाहते नहीं देते। (४) चौथी चीज़ 'मग़फ़िरत' (क्षमा/माफ़ी) है। अल्लाह तआला फ़रमाते हैं: 'और अल्लाह तआला शिर्क के अलावा गुनाह बख़्श देते हैं जिसके गुनाह बख़्शना चाहते हैं।' (५) पाँचवीं चीज़ 'तौबा' है। इर्शाद है: 'और अल्लाह तआला तौबा की तौफ़ीक़ देंगे जिसे चाहेंगे या तौबा क़बूल फ़रमाएँगे जिसकी तौबा क़बूल करना चाहेंगे।' इन पाँचों को तहरीर करके इमाम ग़ज़ाली फ़रमाते हैं कि देखो इन सब में अल्लाह ने शर्त वाली सूरत इख़्तियार फ़रमाई है, लेकिन शुक्र करने वाले को मज़ीद नेमत देने का जो वादा फ़रमाया है, वह क़तई और यक़ीन (पूर्ण निश्चितता) के साथ फ़रमाया है, उसमें कोई शर्त या अपवाद नहीं रखा। इर्शाद है: 'अगर तुम शुक्र करोगे तो मैं (बिना किसी शर्त के) हर शुक्र करने वाले को मज़ीद नेमतें दूँगा।' इससे शुक्र की अहमियत का पता चलता है कि शुक्र किस क़दर अहम चीज़ है। और इसी के साथ-साथ शुक्र करने का तीसरा फ़ायदा यह भी होगा कि अल्लाह की तरफ से हम पर आने वाली मुसीबतें टल जाएँगी। अल्लाह फ़रमाते हैं: 'अगर तुम शुक्र करते रहो तो मुझे यह ज़ेब नहीं देता कि मैं तुम्हें तकलीफ़ें पहुँचाऊँ या तुम्हें अज़ाब से दोचार करूँ।' तो शुक्र इतनी अज़ीम (महान) चीज़ है कि बारगाहे-इलाही में यह अमल क़बूल होता है, मज़ीद की तौफ़ीक़ मिलती है और आने वाली तकलीफ़ें दूर होती हैं। चौथा फ़ायदा शुक्र का यह होगा कि अल्लाह की तरफ से जज़ा (प्रतिफल/इनाम) मिलेगी। चुनाँचे अल्लाह तआला फ़रमाते हैं: 'हम शुक्र करने वालों को जज़ा देंगे।' जज़ा के बारे में यह नहीं बताया कि क्या देंगे। इससे मालूम होता है कि यह एक ख़ास क़िस्म की जज़ा है जो उनकी शान के लाय़क़ है। यह शुक्र है। __________📝📝__________ (किताब: ख़ुत्बाते मौलाना नईमुद्दीन जिल्द: १ सफ़्हा नंबर: १८ - १९ ख़तीब: हज़रत मौलाना नईमुद्दीन साहब। चयन: इस्लामिक ट्यूब प्रो ऐप)
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