हज़रत अब्दुल्लाह इब्ने उमर (रज़ियल्लाहु अन्हु) का एक वाक़या और पिता के मित्रों का सम्मान

हज़रत अब्दुल्लाह इब्ने उमर (रज़ियल्लाहु अन्हु) का एक वाक़या और पिता के मित्रों का सम्मान

हज़रत अब्दुल्लाह इब्ने उमर (रज़ियल्लाहु अन्हु) एक बार सफ़र पर जा रहे थे, ग़ालिबन (शायद) हज या उमरे का सफ़र था। साहिबे-हैसियत (धनी) अरबों की आदत के मुताबिक़, आप सफ़र पर जाते हुए सवारी के ऊँट के साथ एक खच्चर नुमा गधा भी ले गए (अरबों के गधे हमारे यहाँ के गधों की तरह नहीं होते, बल्कि हमारे यहाँ के खच्चरों की विशेषताओं वाले होते हैं)। होता यह था कि दौरान-ए-सफ़र जब ऊँट की सवारी से उकता (थक) जाते, तो कुछ देर के लिए गधे पर सवार हो जाते। उस पर पालान (काठी) भी था। रास्ते में एक ग़ैर-मारूफ़ (अपरिचित) जगह पर एक देहाती बद्वू (गांव का रहने वाला) सामने आया। आप फ़ौरन उतरे और बड़ी इज़्ज़त से पेश आए, फिर अपनी पगड़ी उठाई और देहाती के सर पर रखी और वह गधा उसके सुपुर्द कर दिया। हज़रत इब्ने उमर (रज़ियल्लाहु अन्हु) के साथियों और शागिर्दों ने कहा कि आपने एक देहाती को पूरी सवारी और अमामा (पगड़ी) दे दिया? आपने फ़रमाया कि ये साहब मेरे वालिद (पिता) के दोस्त हैं, और फिर वह हदीस पढ़ी जिसका मफ़हूम (अर्थ) यह है कि वालिद के साथ एक नेकी यह भी है कि उनके दोस्तों के साथ अच्छा बर्ताव करो। और अच्छे बर्ताव का कम से कम दर्जा यह है कि उसके लिए दुआ करे। हदीस शरीफ़ में आता है कि जब इंसान दूसरे के लिए दुआ करता है, तो अल्लाह की तरफ़ से फ़रिश्ता वहाँ खड़ा होता है और कहता है: "वलक मिस्लु ज़ालिक" (हाँ, तेरे लिए भी ऐसा ही हो)। मासूम फ़रिश्ता जब दुआ करे, तो उसकी क़बूलियत यक़ीनी (निश्चित) है। _____________________________________ (किताब: माहनामा फलाह-ए-दारैन कराची (नवंबर) सफ़्हा नंबर: २१ चयन: इस्लामिक ट्यूब प्रो ऐप)

सबसे हालिया

Naats