एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) की नई रिपोर्ट ने राजनीतिक फंडिंग की एक चौंकाने वाली तस्वीर पेश की है। वित्त वर्ष 2024-25 में गुजरात की 29 पंजीकृत गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक पार्टियों (आरयूपीपी) ने कुल 510.41 करोड़ रुपये की आय घोषित की है। यह आंकड़ा देश के किसी भी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश से सबसे ज्यादा है।
दिल्ली की 73 पार्टियों ने 218.48 करोड़ और राजस्थान की 23 पार्टियों ने 173.36 करोड़ रुपये की आय बताई। इन तीन राज्यों की कुल आय 902.25 करोड़ रुपये रही, जो देशभर की 734 पार्टियों द्वारा घोषित कुल 1,118.49 करोड़ रुपये का लगभग 80.67 प्रतिशत है।
करोड़ों की कमाई, लेकिन चुनावी सफलता शून्य
रिपोर्ट का सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि भारी-भरकम आय के बावजूद इन पार्टियों का चुनावी प्रदर्शन बेहद कमजोर रहा। वित्त वर्ष 2024-25 में सबसे ज्यादा आय घोषित करने वाली शीर्ष 15 पार्टियों में से किसी ने भी एक सीट नहीं जीती।
2020-21 से 2024-25 के बीच इन 15 पार्टियों ने कुल 35 सीटों पर चुनाव लड़ा, लेकिन सफलता सिर्फ एक सीट तक सीमित रही।
सबसे ज्यादा आय वाली पार्टियों में गुजरात की न्यू इंडिया यूनाइटेड पार्टी और भारतीय राष्ट्रीय जनतांत्रिक दल तथा राजस्थान की भारतीय गरीब विकास कल्याण पार्टी शामिल हैं। इन तीनों की कुल घोषित आय 660.52 करोड़ रुपये है, जो शीर्ष 15 पार्टियों की कुल आय (973.93 करोड़) का 67.82 प्रतिशत बैठता है।
पारदर्शिता की कमी और आयकर छूट
एडीआर के अनुसार, ये 734 पार्टियां देश की कुल गैर-मान्यता प्राप्त पार्टियों का केवल 35 प्रतिशत हैं। बाकी 65 प्रतिशत (करीब 1,330 पार्टियां) की वार्षिक ऑडिट रिपोर्ट और चंदे का ब्योरा सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है।
नियमों के मुताबिक राजनीतिक पार्टियों को आयकर से छूट मिलती है, बशर्ते वे आयकर रिटर्न दाखिल करें और 20,000 रुपये से अधिक के चंदे का ब्योरा चुनाव आयोग को दें। यहां तक कि अगर कोई पार्टी यह घोषित कर दे कि उसे किसी एक दानदाता से 20,000 रुपये से ज्यादा का चंदा नहीं मिला, तब भी उसे छूट मिल सकती है।
चुनाव आयोग की सख्ती
गौरतलब है कि चुनाव आयोग ने अगस्त-सितंबर 2025 में दो चरणों में 808 गैर-मान्यता प्राप्त पार्टियों को सूची से हटा दिया था। ये पार्टियां लगातार छह साल तक कोई चुनाव नहीं लड़ने के कारण कार्रवाई के दायरे में आई थीं। आयोग ने इन्हें कारण बताओ नोटिस जारी कर अपना पक्ष रखने का मौका भी दिया था।
रिपोर्ट से साफ है कि बड़ी संख्या में गैर-मान्यता प्राप्त पार्टियां भारी आय घोषित कर रही हैं, लेकिन चुनावी मैदान में उनकी उपस्थिति और सफलता न के बराबर है। इससे राजनीतिक फंडिंग और पारदर्शिता पर नए सवाल खड़े हो गए हैं।