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पोलैंड में संवैधानिक संकट: ट्रिब्यूनल चीफ के निलंबन पर आधी रात सड़कों पर उतरे लोग, 'तख्तापलट' का आरोप, राष्ट्रपति नाव्रोकी ने बीच में छोड़ा विदेश दौरा

पोलैंड में नई राजनीतिक उथल-पुथल मच गई है। कॉन्स्टिट्यूशनल ट्रिब्यूनल के चीफ बोगदान श्विएचकोव्स्की को निलंबित किए जाने के विरोध में हो रहे प्रदर्शनों के बीच वहां दंगा-रोधी पुलिस तैनात कर दी गई। इस टकराव ने न्यायपालिका पर नियंत्रण को लेकर प्रधानमंत्री डोनाल्ड टस्क की सरकार और विपक्षी 'लॉ एंड जस्टिस' (PiS) पार्टी के बीच सत्ता संघर्ष को और तेज कर दिया है।

आधी रात क्या हुआ?

ट्रिब्यूनल पर पुलिस का पहरा था, जबकि प्रदर्शनकारी श्विएचकोव्स्की के निलंबन का विरोध कर रहे थे।

तनाव तब बढ़ा, जब प्रदर्शनकारियों ने अदालत की घेराबंदी तोड़ दी और कथित तौर पर पुलिसकर्मियों पर कुछ चीजें फेंकीं।

पुलिस ने तीन लोगों को हिरासत में लिया।

PiS समर्थित राष्ट्रपति कैरोल नाव्रोकी सेनेगल की यात्रा बीच में छोड़कर वारसॉ लौट आए। उन्होंने X पर लिखा, "ऐसे वक्त में राष्ट्रपति का पोलैंड में होना जरूरी है।" उनके चीफ ऑफ स्टाफ ने पुष्टि की कि वे ट्रिब्यूनल कैंपस पहुंचे।

विवाद की जड़ क्या है?

न्याय मंत्री वाल्डेमार जुरेक ने श्विएचकोव्स्की और उपाध्यक्ष बार्टलोमी सोचांस्की की कानूनी छूट हटाने की मांग की, ताकि उन पर आपराधिक कार्यवाही शुरू हो सके। आरोप है कि उन्होंने 5 नवनिर्वाचित जजों को ट्रिब्यूनल की कार्यवाही में शामिल होने से रोका। ट्रिब्यूनल ने नेतृत्व का बचाव करते हुए कहा कि दोनों की नियुक्ति कानूनी रूप से हुई थी, और सरकार के कदम को 'तख्तापलट' करार दिया।

न्यायपालिका क्यों बनी राजनीतिक अखाड़ा?

2015 से 2023 तक सत्ता में रही PiS सरकार ने न्यायिक सुधार लागू किए थे।

यूरोपीय संस्थानों सहित कई आलोचकों का कहना था कि इनसे न्यायिक आजादी कमजोर हुई और अदालतों पर राजनीतिक प्रभाव बढ़ा।

यूरोपीय मानवाधिकार न्यायालय और यूरोपीय संघ की अदालत ने भी ट्रिब्यूनल में जजों की नियुक्ति पर चिंता जताई थी।

2023 में पदभार संभालने वाले टस्क ने इन सुधारों को पलटने का वादा किया था, लेकिन राष्ट्रपति नाव्रोकी और पूर्व राष्ट्रपति आंद्रेज डुडा, जो दोनों विपक्षी खेमे से जुड़े हैं, उनका कड़ा विरोध कर रहे हैं।

दोनों पक्षों के तर्क

टस्क सरकार: कानून के शासन की बहाली के लिए कड़े कदम जरूरी थे।

PiS नेता: उन्होंने कदम की निंदा की और लोगों से विरोध करने का आह्वान किया।

अगले साल संसदीय चुनाव होने हैं, ऐसे में इस टकराव ने संवैधानिक अधिकार, न्यायिक स्वतंत्रता और कार्यकारी शक्तियों की सीमाओं पर नए सवाल खड़े कर दिए हैं।