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रामलीला मैदान में INDIA ब्लॉक की 'महारैली': CJP का समर्थन, क्या सड़क के सहारे अपनी मांग आगे बढ़ा पाएगा विपक्ष?

दिल्ली के रामलीला मैदान में 1 नवंबर को होने वाली INDIA गठबंधन की रैली के लिए माकपा सांसद जॉन ब्रिटास ने 10 लाख लोगों के पहुंचने का दावा किया है। यह आयोजक पक्ष के एक नेता का दावा है, जुटी हुई भीड़ का आंकड़ा नहीं। बड़ा राजनीतिक सवाल कांग्रेस और राहुल गांधी के सामने है: क्या वे चुनाव आयोग के खिलाफ अपने अभियान से आम लोगों को जोड़ पाएंगे?

रैली से पहले 'सांकेतिक संसद'

31 अक्टूबर को खरगे के आवास पर आयोजित सांकेतिक संसद में मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) को हटाने का प्रस्ताव पारित हुआ। अध्यक्षता मीरा कुमार ने की, जबकि सपा के अवधेश प्रसाद और TMC के सौगत रॉय उपाध्यक्ष की भूमिका में थे। खरगे ने CEC पर वोटर लिस्ट में गड़बड़ी और निष्पक्षता से काम न करने समेत छह आरोप लगाए। राहुल गांधी ने कहा कि लोगों की आवाज संसद तक नहीं पहुंचने दी जा रही, इसलिए विपक्ष को बाहर जुटना पड़ा।

विपक्ष की रणनीति क्या है?

वरिष्ठ पत्रकार शरद गुप्ता के मुताबिक, संसद के भीतर मांग आगे न बढ़ पाने पर विपक्ष अब जनता का साथ मांग रहा है और सरकार पर दबाव बनाना चाहता है।

उनका मानना है कि सांकेतिक संसद और रैली, दोनों का मकसद SIR और CEC के खिलाफ अभियान को चर्चा में बनाए रखना है। त्योहारों में ध्यान बंटने से विपक्ष को लगता है कि मुद्दा दोबारा उठाने में वक्त लगेगा।

रशीद किदवई इसे विरोध के पुराने सांकेतिक तरीकों की कड़ी में देखते हैं और आम लोगों, युवाओं, बुद्धिजीवियों व सामाजिक संगठनों की भागीदारी को अहम मानते हैं।

कांग्रेस के सामने दो चुनौतियां हैं: कार्यकर्ताओं और सहयोगियों को एक मंच पर लाना, और अपना संदेश उन लोगों तक पहुंचाना, जो नियमित रूप से पार्टी प्रदर्शनों में शामिल नहीं होते। दिल्ली कांग्रेस ने व्यवस्था के लिए 20 समितियां बनाई हैं।

व्यापारियों की आपत्ति और पुलिस की अनुमति

चैंबर ऑफ ट्रेड एंड इंडस्ट्री (CTI) ने सोनिया गांधी से रैली टालने की अपील की थी और 12,000 करोड़ रुपये के कारोबार पर असर की आशंका जताई थी। दिल्ली पुलिस रैली के लिए अनापत्ति प्रमाणपत्र जारी कर चुकी है।

सरकार और भाजपा का पलटवार

किरेन रिजिजू: 2024 में ज्ञानेश कुमार CEC नहीं थे, फिर कांग्रेस लगातार तीसरा लोकसभा चुनाव क्यों हारी? उन्होंने मृतकों, दूसरी जगह जा चुके लोगों और दोहराए गए नामों को हटाने पर भी कांग्रेस का रुख पूछा।

अमित शाह: 30 अक्टूबर को लखनऊ में उन्होंने विपक्ष को संसद में SIR पर चर्चा की चुनौती दी और विशेष सत्र की बात कही। यह पेशकश थी, औपचारिक घोषणा नहीं। उन्होंने चुनावी हार के बाद आयोग को दोष देने की तुलना मैच हारकर अंपायर को दोष देने से की।

जेपी नड्डा: कांग्रेस जीतने पर अपनी काबिलियत बताती है और हारने पर आयोग को दोष देती है।

संबित पात्रा: कथित वोट चोरी पर कांग्रेस के बूथ एजेंटों ने आपत्तियां क्यों नहीं कीं?

तेजस्वी सूर्या: कांग्रेस को सांकेतिक आम चुनाव कराकर राहुल गांधी को प्रधानमंत्री घोषित कर देना चाहिए।

CEC को हटाने की प्रक्रिया क्या है?

सांकेतिक संसद के प्रस्ताव का कोई कानूनी असर नहीं है। 12 मार्च को लोकसभा में 130 और राज्यसभा में 63 सांसदों के हस्ताक्षर वाले नोटिस दिए गए थे, जिन्हें 6 अप्रैल को लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा के सभापति ने स्वीकार नहीं किया। 24 अप्रैल को राज्यसभा में 73 सांसदों के हस्ताक्षर के साथ नया नोटिस दिया गया। नोटिस के लिए लोकसभा में कम से कम 100 या राज्यसभा में 50 सांसद चाहिए, लेकिन प्रस्ताव दोनों सदनों में अलग-अलग पारित होना जरूरी है।

चुनाव आयोग का पक्ष

26 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट में आयोग ने कहा कि SIR के तीनों आदेश सभी तीन सदस्यों की सहमति से जारी हुए थे।

फॉर्म-6 में बदलाव का आरोप खारिज करते हुए आयोग ने कहा कि SIR की अतिरिक्त घोषणा अलग दस्तावेज है और संबंधित अधिकारी के आदेश के बिना कोई नाम जोड़ा, हटाया या बदला नहीं जाता।

नतीजों से समर्थन परखने की उलझन

शरद गुप्ता के मुताबिक, विपक्ष का आरोप ही यह है कि चुनाव निष्पक्ष नहीं हो रहे, इसलिए वह उन्हीं नतीजों को अपने समर्थन की कसौटी मानने पर सवाल उठाता है। पश्चिम बंगाल का उदाहरण दिया गया, जहां करीब 60 लाख नाम जांच के लिए भेजे गए और सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में न्यायिक जांच के बाद करीब 27.16 लाख नाम हटाने का फैसला हुआ। TMC सांसद डेरेक ओब्रायन ने 31 सीटों के नतीजे रद्द करने की मांग की थी, जबकि आयोग का जवाब था कि TMC ने भी ऐसी 21 सीटें जीतीं, जहां जीत का अंतर हटे नामों से कम था।

CJP के समर्थन के मायने

कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने 28 अक्टूबर को बयान जारी कर SIR में योग्य मतदाताओं के नाम बाहर होने पर चिंता जताई और CEC के इस्तीफे की मांग दोहराई। संस्थापक अभिजीत दीपके ने X पर रैली के समर्थन की घोषणा की। संगठन का कहना है कि वह स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के लिए लड़ने वाले सभी संगठनों का समर्थन करेगा। यह कांग्रेस में शामिल होने या उसके पूरे राजनीतिक कार्यक्रम से सहमति की घोषणा नहीं है। किदवई के मुताबिक असली सवाल यह है कि क्या ऐसे समूह आगे भी कांग्रेस और सहयोगियों के साथ काम करेंगे। फिलहाल समर्थन रैली तक सीमित है।