सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट की आड़ में टूटेगी सदी पुरानी 'कदीमी मस्जिद'?, केंद्र के फैसले से अल्पसंख्यक समुदाय में रोष
नई दिल्ली: लुटियंस दिल्ली के कृषि भवन परिसर में स्थित सदी पुरानी ऐतिहासिक ‘कदीमी मस्जिद’ के अस्तित्व पर अब सीधा संकट मंडरा रहा है। केंद्र सरकार ने दिल्ली उच्च न्यायालय में एक हलफनामा दायर कर साफ कर दिया है कि ‘सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट’ के तहत इस मस्जिद को हटाया जाएगा। सरकार के इस कदम ने एक बार फिर विकास परियोजनाओं की आड़ में धार्मिक स्थलों को निशाना बनाए जाने की बहस को तेज कर दिया है।
सरकार की दलील: 'सेक्युलर ढांचे के खिलाफ है मस्जिद'
आवासन और शहरी कार्य मंत्रालय के अधीन भूमि और विकास कार्यालय (L&DO) द्वारा कोर्ट में पेश की गई स्टेटस रिपोर्ट में बेहद कड़ा रुख अपनाया गया है। केंद्र का कहना है कि कृषि भवन और शास्त्री भवन की जगह पर ‘कॉमन सेंट्रल सेक्रेटेरिएट’ की इमारत संख्या 4 और 5 बनाई जानी हैं, जो ‘सर्वोच्च राष्ट्रीय महत्व’ की परियोजना है।
सरकार ने यह दलील भी दी है कि किसी भी केंद्रीय प्रशासनिक परिसर के भीतर स्थायी धार्मिक ढांचे की मौजूदगी ‘सरकारी संपत्ति के धर्मनिरपेक्ष (सेक्युलर) चरित्र के खिलाफ है।’ सरकार के मुताबिक, 1940 के समझौते के तहत मस्जिद समिति को केवल सशर्त कब्जा दिया गया था, जो कोई स्थायी कानूनी अधिकार नहीं देता।
संवैधानिक अधिकारों की गुहार और सरकार का इनकार
कदीमी मस्जिद दशकों से कृषि भवन, शास्त्री भवन और आसपास के मंत्रालयों में काम करने वाले मुस्लिम कर्मचारियों के लिए इबादत का प्रमुख केंद्र रही है। मस्जिद की देखरेख समिति ने सितंबर में हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। समिति ने विकास कार्य (सेंट्रल विस्टा) का विरोध न करते हुए केवल इतना निवेदन किया था कि या तो मस्जिद को सुरक्षित रखा जाए, या परिसर के पास ही इबादत के लिए कोई वैकल्पिक जगह दी जाए।
हालांकि, केंद्र ने संविधान के अनुच्छेद 25 (धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार) के तहत दी गई इस दलील को खारिज कर दिया। सरकार का कहना है कि किसी सरकारी जमीन पर खास स्थान पर ही नमाज पढ़ने की मांग करना कोई मौलिक अधिकार नहीं है। विकल्प के तौर पर सरकार ने कर्मचारियों को 2 किलोमीटर दूर इंडिया गेट के पास स्थित ‘शाही मस्जिद जाब्ता गंज’ जाने की सलाह दी है।
सियासी और सामाजिक सवाल: क्या बहाने से निशाना बनाए जा रहे हैं धार्मिक स्थल?
सरकार के इस हलफनामे के बाद अल्पसंख्यक समुदाय और नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं के बीच गहरी नाराजगी और चिंता देखी जा रही है। आलोचकों का कहना है कि यह कोई इकलौता मामला नहीं है, बल्कि पिछले कुछ समय से विकास, अतिक्रमण हटाने और नए नियमों की आड़ में लगातार सदियों पुरानी मस्जिदों और दरगाहों को निशाना बनाया जा रहा है।
विपक्ष और सामाजिक संगठनों का आरोप है कि सरकार बहुसंख्यक वर्ग के एक खास हिस्से और दक्षिणपंथी संगठनों को खुश करने के लिए इस तरह की कार्रवाइयों को अंजाम दे रही है। सवाल यह उठाया जा रहा है कि जब सरकारी दफ्तरों में अन्य धार्मिक अनुष्ठान और पूजा-पाठ के कार्यक्रम होते हैं, तब 'सेक्युलर ढांचे' की दलील क्यों नहीं दी जाती?
समुदाय के लोगों का मानना है कि कभी वक्फ कानूनों में बदलाव के नाम पर, तो कभी मास्टर प्लान और सड़क चौड़ीकरण के बहाने ऐसे कायदे-कानून और स्थितियां बनाई जा रही हैं, जिनसे मुस्लिम समुदाय को अपने ही ऐतिहासिक और धार्मिक स्थलों से बेदखल होना पड़ रहा है। रोजमर्रा की नौकरी के बीच 2 किलोमीटर दूर जाकर नमाज पढ़ने का सरकारी सुझाव व्यावहारिक समाधान कम और समुदाय की धार्मिक जरूरतों की अनदेखी ज्यादा नजर आता है।