माल्टा के घाव: हज़रत शैखुल हिंद की महान क़ुर्बानियां और अटूट ईमान

माल्टा के घाव: हज़रत शैखुल हिंद की महान क़ुर्बानियां और अटूट ईमान

हज़रत शैखुल हिंद को दीन (धर्म) के लिए बड़ी क़ुर्बानियां देनी पड़ीं। उनके हालात-ए-ज़िंदगी (जीवनी) में लिखा है कि जब उनका देहांत हकीम मोहम्मद अजमल की कोठी पर हुआ, तो ग़ुस्ल (अंतिम स्नान) देने वाले ने देखा कि उनकी पीठ पर ज़ख़्मों के बड़े-बड़े निशान हैं। उसने रिश्तेदारों से पूछा, उन्होंने घर वालों से पूछा, लेकिन किसी को कुछ मालूम नहीं था। सब हैरान थे। परिवार वालों से भी इस बात को छुपा कर रखा गया था। आख़िर यह क्या मामला है? हज़रत मौलाना हुसैन अहमद मदनी रहमतुल्लाह अलैह उस वक़्त कलकत्ता गए हुए थे। उन्हें जब शैखुल हिंद के देहांत का पता चला, तो वह वहाँ से जनाज़े में शिरकत (शामिल होने) के लिए आए। उनसे किसी ने पूछा कि "आप बताइए कि यह क्या मामला है?" हज़रत मदनी रहमतुल्लाह अलैह की आँखों में आँसू आ गए, वह फ़रमाने लगे, "यह एक राज़ (रहस्य) था और हज़रत ने मना फ़रमाया था कि 'मेरी ज़िंदगी में तुमने किसी को नहीं बताना।' इसलिए यह एक अमानत थी और मैं बता नहीं सकता था। अब तो हज़रत वफ़ात पा चुके हैं (चल बसे हैं), लिहाज़ा अब मैं बता सकता हूँ।" वह फ़रमाने लगे कि "जब हम माल्टा में क़ैद थे, उस वक़्त हज़रत को इतनी सज़ा दी जाती, इतनी सज़ा दी जाती कि उनके जिस्म पर ज़ख़्म हो जाते थे और कई मर्तबा ऐसा होता था कि फ़रंगी (अंग्रेज़) दहकते अंगारे बिछा देते और हज़रत को उसके ऊपर लिटा देते थे। जेल के अधिकारी कहते कि 'महजूद! सिर्फ़ इतना कह दो कि मैं फ़रंगियों का मुख़ालिफ़ (विरोधी) नहीं हूँ, हम तुम्हें छोड़ देंगे', मगर हज़रत फ़रमाते कि 'नहीं, मैं यह अलफ़ाज़ (शब्द) नहीं कह सकता।' वे उन्हें बहुत ज़्यादा तकलीफ़ देते थे। हज़रत जब रात को अपनी जगह पर सोने के लिए आते, तो सो भी नहीं पाते थे। नींद न आने की वजह से तकलीफ़ और उधर से यातनाएँ (अज़िय्यतें)। हम लोग हज़रत की हालत देखकर परेशान हो जाते। हमने एक दिन हिम्मत करके कहा, 'हज़रत! आख़िर इमाम मुहम्मद रहमतुल्लाह अलैह ने "किताबुल हियल" (कानूनी युक्तियों की किताब) लिखी है, लिहाज़ा क्या कोई ऐसा हिला (उपाय/तरीका) है कि आप उनकी सज़ा से बच जाएँ?' हज़रत ने फ़रमाया, 'नहीं।' अगले दिन हज़रत को फिर सज़ा दी गई। जब कई दिनों तक लगातार यह सज़ा मिलती रही, तो एक दिन एक फ़रंगी खड़ा होकर कहने लगा, 'तू यह क्यों नहीं कहना चाहता कि मैं फ़रंगियों का मुख़ालिफ़ नहीं हूँ?' उस वक़्त हज़रत ने फ़रमाया कि 'मैं इसलिए नहीं कहना चाहता क्योंकि मैं अल्लाह के दफ़्तर से अपना नाम कटवाकर तुम्हारे दफ़्तर में नाम नहीं लिखवाना चाहता।' हज़रत मदनी रहमतुल्लाह अलैह फ़रमाते हैं कि एक बार हज़रत आए तो हमने देखा कि आपको बेहद दर्दनाक सज़ा दी गई है। हम हज़रत के साथ तीन-चार शागिर्द (शिष्य) थे। हम सब ने मिलकर अर्ज़ किया, 'हज़रत! कुछ मेहरबानी फ़रमाएँ (अपने आप पर रहम खाएं)।' अब जब हज़रत ने देखा कि सबने मिलकर बात की, तो उनके चेहरे पर ग़ुस्से के आसार ज़ाहिर हुए, वह फ़रमाने लगे, 'हुसैन अहमद! तुम मुझे क्या समझते हो? मैं आध्यात्मिक (रूहानी) बेटा हूँ हज़रत बिलाल का, मैं रूहानी बेटा हूँ हज़रत ख़ुबैब का, मैं रूहानी बेटा हूँ हज़रत सुमैय्या (रज़ियल्लाहु अन्हा) का, मैं रूहानी बेटा हूँ इमाम अहमद बिन हम्बल का, जिन्हें इतने कोड़े मारे गए कि अगर हाथी को भी मारे जाते तो वह भी चिल्ला उठता; मैं रूहानी बेटा हूँ मुजद्दिद अल्फ़-ए-सानी का, जिन्हें दो साल के लिए ग्वालियर के क़िले में क़ैद रखा गया था; मैं रूहानी बेटा हूँ शाह वलीउल्लाह मुहद्दिस देहलवी का, जिनके हाथों को कलाइयों के पास से तोड़कर बेकार कर दिया गया था। क्या मैं इन फ़रंगियों के सामने शिकस्त (हार) तस्लीम कर लूं? ये मेरे जिस्म से जान तो निकाल सकते हैं, मगर दिल से ईमान नहीं निकाल सकते!'"

सबसे हालिया

Naats