Rabi Ul Awal New Naat Sharif 2025 - Mustafa Aa Gaye - Banke Tarikiyo Me Ziya Aagaye Hafiz Umar Farooq Naqshbandi - 12 Rabi ul awal 2025

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दुनिया के लिए सबसे बदसूरत लेकिन अपने समय के बेहतरीन किरदार

दुनिया के लिए सबसे बदसूरत लेकिन अपने समय के बेहतरीन किरदार

लिज़ी को दुनिया की सबसे बदसूरत महिला कहा गया, उस पर लाखों मीम बनाए गए, यहाँ तक कि उससे यह भी कहा गया कि इतनी बदसूरती के साथ जीने से बेहतर है मर जाओ, लेकिन उसने हिम्मत नहीं हारी और ग्रेजुएशन के बाद तीन किताबें लिखकर लाखों हुस्न (सुंदरता) वालों के मुंह बंद कर दिए और फिर वह दुनिया की बेहतरीन मोटिवेशनल स्पीकर में से एक बन गई और मायूस (निराश) लोगों को जीने का ढंग सिखाने वाली बन गई। इसी तरह आलम-ए-इस्लाम की मशहूर शख्सियत जाहिज़ भी थे। जाहिज़ एतकादन (आस्था से) मोतज़ली थे और बेहद बदसूरत थे लेकिन बेहद ज़हीन (बुद्धिमान) थे, जितने बदसूरत थे उतने ही अज़ीम (महान) आलिम (विद्वान) थे। जाहिज़ की बदसूरती के बारे में कहा गया: शायर कहता है- "अगर सुअर को दोबारा मस्क (विकृत) किया जाए, तो भी वह जाहिज़ से कम बदसूरत होगा।" किसी ने जाहिज़ से पूछा, "क्या आप कभी शर्मिंदा हुए?" कहा, "हाँ, एक बार एक बूढ़ी औरत मेरे पास आई और कहा, 'मुझे आपसे कुछ काम है, मेरे साथ आएं।' मैं चला गया। वह मुझे एक सुनार के पास ले गई और सुनार के सामने मुझे खड़ा करके चली गई। मैंने सुनार से पूछा, 'मेरे लायक कोई हुक्म?' कहने लगा, 'यह बूढ़ी औरत मुझसे मांग कर रही थी कि मैं उसे शैतान की मूर्ति बना कर दूँ। मैंने कहा कि मैंने शैतान को देखा नहीं है, तो वह बोली कि मैं लाती हूँ तुम वैसी मूर्ति बना देना। फिर वह आपको साथ ले आई और कहा: ऐसा होता है शैतान!!!'" इस सब के बावजूद जाहिज़ इल्म (ज्ञान) का पहाड़ थे। उलूम-ए-इस्लामिया (इस्लामिक विज्ञान) में जहाँ भी बलाग़त (वाक्पटुता) का ज़िक्र आता है, जाहिज़ एक सुतून (स्तंभ) की तरह नज़र आते हैं, लेकिन उन्होंने अपनी बदसूरती को हुसूल-ए-इल्म (ज्ञान प्राप्त करने) और बड़ा इंसान बनने में रुकावट नहीं बनने दिया। दो मिसालें आपके सामने पेश की हैं; एक लिज़ी की और दूसरी जाहिज़ की कि इतने बदसूरत कि कोई उनके पास न बैठे और न अपने पास उनको बैठने दे, लेकिन उन्होंने ऐसा कमाल किया कि लोग उनसे मिलने के मोहताज़ हो गए। आप में क्या कमी है? आप क्यों एहसास-ए-कमतरी (हीनभावना) के शिकार हैं? आप क्यों मायूस हैं? हिम्मत करें, हौसला रखें और दुनिया को अपनी मर्ज़ी के मुताबिक चलाएं और यूं कहा करें: "हमसे ज़माना खुद है, ज़माने से हम नहीं।"

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