पूर्ण स्वतंत्रता का भ्रम: अभिनेत्री हुमैरा असगर की दर्दनाक कहानी

पूर्ण स्वतंत्रता का भ्रम: अभिनेत्री हुमैरा असगर की दर्दनाक कहानी

"तो हे आँख वालों! इबरत (सीख) हासिल करो।" यह उन लोगों के लिए एक सबक है जो "मेरा जिस्म, मेरी मर्जी" का नारा लगाते हैं। मर्जी भी उसी की थी और जिस्म भी उसी का था, मगर उसके बाद जो हुआ वह सन्नाटे से गूंजता हुआ एक कमरा था। बंद दरवाजे के पीछे महीनों से खामोश पड़ी एक लाश थी, और आस-पास न कोई रोने वाली आँख थी, न कोई मातम, और न कोई दुआ। बस दीवारें थीं, जो चीख-चीखकर उस औरत की तन्हाई (अकेलेपन) की गवाही दे रही थीं, जो कभी अपनी स्वायत्तता (خودمختاری) पर नाज करती थी। उसने रिश्तों के रेशमी बंधनों को गुलामी की जंजीर समझकर तोड़ दिया था, जो फेमिनिज्म (ناری واد) की अफीम से मदहोश होकर अपने परिवार, भाई, पिता और सबसे बढ़कर अपने रब से भी रूठ गई थी। "अभिनेत्री हुमैरा असगर"—एक खूबसूरत चेहरा, एक आजाद औरत, एक मशहूर नाम। लेकिन क्या वाकई वह कामयाब थी? पुलिस अधिकारी जब उसके भाई को फोन करता है तो जवाब मिलता है: "इसके पिता से बात करें।" और जब पिता को फोन किया जाता है तो एक बाप की जुबान से निकलता है: "हमारा उससे कोई संबंध नहीं है, हम बहुत पहले उससे नाता तोड़ चुके हैं। लाश है, तो जैसे चाहो दफनाओ।" फोन बंद हो जाता है, मगर सवाल खुला रह जाता है कि वह कौन सी जिंदगी थी जिसने एक पिता के दिल को इतना सख्त कर दिया? वह कौन सा रास्ता था जिसने भाई की गैरत (सम्मान) को खामोश कर दिया? वह कौन सी सोच थी जिसने एक जीते-जागते वजूद को महीनों लाश बनाकर सड़ने के लिए छोड़ दिया? यह महज एक घटना नहीं है, यह फेमिनिज्म की वह भयानक तस्वीर है, जो विज्ञापनों में खूबसूरत, भाषणों में प्रभावशाली और सोशल मीडिया पर क्रांतिकारी लगती है, मगर अंदर से खोखली, अकेली और अंधेरे से भरी होती है। फेमिनिज्म की शुरुआत औरत के अधिकारों से हुई थी, मगर इसका अंत उसकी तन्हाई पर हो रहा है। फेमिनिज्म ने औरत को माँ, बेटी, बहन और पत्नी के पवित्र रिश्तों से निकालकर सिर्फ "स्वयं" (खुद) बना दिया और यही "स्वयं" आखिरकार उसे अकेला कर गया। परिवार की वह संस्था, जिसे सदियों की सभ्यता ने पाला-पोषा था, जिसमें कुर्बानियां, मोहब्बतें, नाराजगियां, मान और रिश्तेदारों की गर्माहट मौजूद थी, उसे आज की औरत ने "जंजीर" समझकर काट दिया। और जब वक्त की तेज धूप ने जलाया, तो कोई छायादार पेड़ साथ नहीं था। फेसबुक की सहेलियां, इंस्टाग्राम के फॉलोअर्स, ट्विटर की आजादी के नारे, सब खामोश थे। पिता का दरवाजा बंद था, भाई का दिल पत्थर हो चुका था, और माँ शायद बरसों पहले रो-रोकर मर चुकी थी। अजीब समाज है यह भी, जहाँ अगर बेटी नासमझ या नाफरमान हो तो पिता जालिम कहलाता है, और अगर पिता अलग हो जाए तो बेटी की आत्मनिर्भरता का जश्न मनाया जाता है। औरत जब घर से निकले, तो "ताकतवर" कहलाती है, जब तलाक ले, तो "साहसी" बन जाती है, जब रिश्ते तोड़े, तो "बगावत" नहीं बल्कि "आत्म-जागरूकता" करार दी जाती है। और जब मर जाए, अकेली, सड़ती हुई लाश के रूप में, तो सारा समाज खामोश तमाशाई बन जाता है। काश हुमैरा असगर ने जाना होता कि फेमिनिज्म, माँ की गोद जैसा संरक्षण नहीं दे सकता। काश वह समझ पाती कि पिता की डांट, मोहब्बत की एक गूंज होती है, और भाई की गैरत, इज्जत की चादर होती है। काश वह जान पाती कि पुरुष-विरोध का नाम महिला-मित्रता नहीं है, बल्कि यह एक वैचारिक भटकाव है जो औरत को उसके रब, उसके दीन (धर्म) और उसकी फितरत (प्रकृति) से काट देता है। महिला मजबूत जरूर हो, आत्मनिर्भर भी हो, लेकिन वह अपनी जड़ों (असल) से जुड़ी रहे। वह माँ का प्यार, पिता की करुणा, भाई की गैरत और पति के साथ को बोझ न समझे। वरना फेमिनिज्म की राह में जो मंजिल है, वह तन्हाई, बेरुखी और बिना कफ़न-दफ़न की लाश है। हुमैरा असगर चली गई, लेकिन फेमिनिज्म की धुंध में खोई और कितनी बेटियां इसी तरह गुम हो रही हैं। हमें तब होश आता है, जब बदबूदार लाश दीवारों से सवाल करने लगती है... "आजादी चाहिए थी न? ले लो… मगर अब मेरे पास कोई नहीं है!" 💔💔💔 ___________📝📝📝___________ मनकूल (साभार) चयन: इस्लामिक ट्यूब प्रो ऐप

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